मैं दिनकर बनने वाला हूँ! Hindi Inspirational Poetry by Agyaat Aadarsh

नमस्कार! आप सभी का स्वागत है इस ब्लॉग पर!

निम्नलिखित कविता “Main Dinkar Banne Wala Hun” वीर रस में लिखी गई एक कविता है जिसके दो हिस्से हैं।

पहले भाग में इंसान ज़िंदगी और असफलताओं से इतना निराश है कि वो खुद को कोस रहा होता है और दूसरा हिस्सा उसके भीतर की आवाज़ है जो उसे जगाने कि कोशिश करती है।

इत्मीनान से इसे पढ़िए, शायद यह कविता आप की ज़िंदगी में कुछ ऊर्जा भर पाए!

आप इसे वीडियो के रूप में भी देख सकते हैं:

तो कविता के बोल कुछ इस प्रकार हैं:

तुच्छ, नीच, मैं हूँ बुरा,
मैं कर्कश, लोभी, बेसुरा,
स्वार्थी, पापी, बेकार मैं,
इस धरती पर धिक्कार मैं,
मैं हताश हूँ, निराश भी,
मैं जीवित हूँ और लाश भी।

घर का बोझ तुम छोड़ दो,
मैं खुद को संभाल ना पाता हूँ,
मैं बिस्तर छोड़ कर उठता हूँ,
फिर बिस्तर पर गिर जाता हूँ।

सपने मेरे कोसों दूर हैं,
हुआ मनोबल चूर-चूर है,
मैं सब कुछ हार कर बैठा हूँ,
पर भई ये किसका कुसूर है?

गांठ-गांठ हैं भरे पड़े,
ऐसा टूटा मैं धागा हूँ,
मैं दुखी हमेशा रहता हूँ,
मैं बहुत बड़ा अभागा हूँ।

अब तुम चाहे जो संज्ञा दे दो,
सब कुछ मुझे स्वीकार है,
मैं विश्वाश मारकर बैठा हूँ,
भला इससे बड़ी कोई हार है?

पर है बैठा कोई मेरे भीतर,
जो आवाज़ लगाते रहता है,
जब मैं आँख बंद कर लेता हूँ,
तो वो आकर कान में कहता है।

मेरे यार तू ज़रा गौर से सुन,
तुझ में कुछ तो बात है,
रोके तुझ को ये ज़माना,
उसकी क्या औकात है।

रण छोड़ कर ना भाग तू,
जा फिर से इम्तेहान दे,
तू खुद को नीच मानता है?
चल अपने खिलाफ बयान दे।

ये आवाज़ मुझे जगाती है,
अब तो मुझे जागना होगा,
असफल चाहे फिर से हो जाऊँ,
एक और बार तो भागना होगा।

ना साथ मेरे कोई खड़ा,
मैं भीतर से भी टूटा हूँ,
पर ये कोई पाप नहीं,
मैं थोड़ा अलग-अनूठा हूँ।

ज़माना पुरुषार्थ का बाधक है,
श्री राम को भी वनवास हुआ,
उस पालनकर्ता कृष्ण का भी,
तब गोकुल से प्रवास हुआ।

हमें न अभी बेशक दिखता हो,
पर दुख के पास चिट्ठियाँ हैं,
दुख भेष बदलकर रहता है,
यह सफलता का डाकिया है।

ज़मानें की ना फिक्र मुझे,
नाकामियाँ मेरा प्रचार करें,
तुम गाली दो, कोसो मुझे,
ये तेज मेरी रफ्तार करें।

जीवन के संघर्ष युद्ध में,
बिना कवच के लड़ूँगा मैं,
और मेरी हार मनाने वालों,
खींच तमाचा जड़ूँगा मैं।

सबकुछ खोकर पा लेने वाला,
मैं स्वयं अकेला पांडव हूँ,
जीवन समर में मर्दन करता,
मैं हीं शिव का तांडव हूँ।

इस बंजर, कठोर मिट्टी से,
मैं प्रखर निखरने वाला हूँ,
अरे जा अंधियारे लंगोट बांध,
मैं दिनकर बनने वाला हूँ!
मैं दिनकर बनने वाला हूँ!!

-समाप्त-

दोस्त हिम्मत रखना, सच कह रहा हूँ- आने वाला वक़्त बेहद खूबसूरत होने वाला है!

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