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मैं लेखक नहीं हूँ – Agyaat Aadarsh
मैं लेखक नहीं हूँ, बस मेरे पिता का एक अंश है मुझ में! मेरे पिताजी ब्रह्मा थे क्योंकि वो दुनिया की रचना करते थे “कहानियों की अनकही, अनसुनी, अनदेखी दुनिया”। “थे” का तात्पर्य यह नहीं है कि वह चेतना में नहीं है बल्कि उनकी रचनाएं नष्ट हो चुकी हैं।
उन्होंने फिल्में लिखीं, कई कॉपियाँ भर दीं पर जिम्मेदारियां उनका हाथ पकड़ उन्हें घर से दूर ले गईं और उनके जाने के बाद उनकी रचनाएं सबकी नजर में रद्दी बन गईं और उस रद्दी के बदले मिल रहा कबाड़ी वाले का प्याज सबको अधिक लाभप्रद लगा।
मुझे ऐसा लगता है कि कबाड़ी वाले ने वो कॉपियाँ किसी किराने वाले को बेच दी होगी, फिर किसी ने उस दुकानदार से 3 रुपये का नमक मांगा होगा तब उसने पापा की मीठी कहानियों पर नमक लपेट उसे थमा दिया होगा।
बोलें तो नमक की कीमत 3 रुपये और पापा की कहानियाँ “फ्री! फ्री!! फ्री!!!”।
वैसे शायद थोड़ा प्रभाव मुझ पर मेरी माँ का भी रहा, बचपन में उन्हें कई बार देखा घर में पहले कुछ अप्रिय होता था फिर माँ रोती थी और अचानक से चुप हो जाती थी। उनके पास एक जर्जर हालत की नोटबुक थी जो शायद मैंने या मेरी बहन ने अधलिखी छोड़ दी होगी, उसे माँ ने बहुत संभाल कर रखा था।
वो उसके कुछ सादे पन्ने ढुँढतीं, कुछ लिखतीं और ऐसे वापस आतीं जैसे जो कुछ देर पहले रो रहा था वो कोई और ही था।
“मैंने वो नोटबुक चुरा ली है, एक अरसे से पढ़ने की हिम्मत जुटा रहा हूँ।”
उस नोटबुक में कुछ भी लिखा हो सकता है और शायद मैं पढ़ना भी नहीं चाहता या फिर मुझमें पढ़ने की हिम्मत ही नहीं है। पर हाँ इतना पता है अब मैं जब भी उदास होता हूँ, मैं एक डायरी के साथ उठकर कहीं जाता हूँ और ऐसे वापस आता हूँ जैसे थोड़ी देर पहले जो इंसान उदास था वो कोई और ही था।
मेरी कलम, कविताएं, कहानियाँ और लिखावट ये सब मेरे लिए पूज्यनीय है पर मैं बिना किसी संकोच के ये सब अपने माता-पिता के चरणों में अर्पित करता हूँ…
